Monday, 27 April 2020

कनका री बडाही

कनका री बड़ाही पई गी
बडने जो हुई जावा त्यार
दराटियाँ अपनियाँ चंडाई लो
तेज करवाई लओ धार
चन्डने वाले बी नी रहे हुण
निहालियाँ बी करी ती बन्द
जलोथरे पथरा पर पलई लो
कने चलाई लो अपना कम्म
अमाँ बापू पहन पाई
सब पूजे खेता परवाथ दिति  लगाई
दिन लगे चार
पर कनक दिति मुकाई
कनक कठि किती
लाई दिति गडयार
गाहने खातर लगी गे करने
ट्रेक्ट्रा रा इनतिज़ार
इतनिया देरा च आया तूफान
कने पया चख नेहरा
सीजी गई सारी कनक
छैब्बर पया बतेरा
खवाड़े रा ज़माना चली गया
तंन्जे बलदां ने गाहन्दे थे गाहण
प्यागा ते संजा तक बलदां जो कुमाई कने
खुश्क हुई जांदे थे प्राण
कड़याठिया ने देंदे थे छेड़ा
कने सूपा ने करदे थे पुनाई
तुपा ने सिरा री हुई जांदी थी पटाक
सुपलिया ने बी करी लैंदे थे छंड फ़ड़ाक
सूपा चकी ने खड़े रहन्दे थे
बागरिया री करदे थे निहाल
घंटे बाद आउँदा था किते ईक लवाटा
निहाली ने हुई जांदा था बुरा हाल
दानेयाँ भरने जो हुँदा था छकू
भुआ टोने जो खारा
बेरड़ा बांदे थे  खेतें
मंडल बी हुँदा था बहुत सारा
खेता रे कंडे कंडे ब्युली थे बांदे
तितरा जे सेल कने पंगयाठु थे बनान्दे
ब्युलिया रे बनाईंदे थे माला जो रस्से
मंडला री बनाइन्दी थी रोटी
स्वाद बड़ा लाजबाब पावें हुन्दी थी मोटी
अजकल ट्रेक्ट्रा ने ही कनका जो गाहन्दे 
कम्म पवे हुई जांदा जल्दी
पर सतवाँ पीपा देंदी हाण
अग्ग सीने च बल्दी
बेशक अजकल सबी चीजां रियाँ
नविंया मशीना आई गियाँ
पर बरोजगारी बदी गई 
पुशतैनी पेशे ख़त्म कराई  गियाँ

✍️ रविंदर कुमार शर्मा

अपनी मुसकान दीजिए

दो दिन की  जिंदगी है, विश्राम मत लीजिए।
मानवता का हो भला,सदकाम सदा कीजिए।

सुख सुविधा छोड़ दे तू जन परमार्थ के लिए,
तन मन धन अपना निष्काम अर्पण कीजिए।

हो भला स्वदेश का प्राणों का फिर भय क्यों,
सुकरात बन के हंस कर बिष प्याला पीजिए।

बैर भाव मन में ना हो  अपना पराया एक हो,
श्रृद्धा सुमन नित प्रेम के  हर दिल में बीजिए।

रोगीवियोगीभोगी ना आधिव्याधि जग में रहे,
परोपकारी  कर्म से  विपद  सब हर  लीजिए।

चुगली निंदा कभी भी हम किसी की ना करें,
हरहाल देखें हर्ष से अपनी मुसकान  दीजिए।

मूरख रोज परेल़ां पाए

माह्णू  करदा  हाए-हाए,
मूरख  रोज  परेल़ां  पाए।

छंदे - छूह्नीं-तरले - मिनतां,
गल्ला परती सगुण मनाए।

दो   नंबर   दे   धंधे   अंदर,
कुद्दी गलती कुण समझाए?

फरज़ी फंडे फरज़ी झगड़े,
टौरी  जो  बींडू  कुण  लाए?

भारत मां दा छैल़ लखारी,
सुच्चे छंदां अज्ज सुणाए।

तांईं होंग "नवीन" तरक्की,
दुनियां  जै-जैकार  गलाए।

      ✍️ नवीन हलदूणवी
मोबाइल - 8219484701
काव्य - कुंज जसूर_176201,
जिला कांगड़ा ,हिमाचल प्रदेश।